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About Book & Author :राजस्थान के श्रीगंगानगर में पले-बढ़े नीरज वधवार ने कॉलेज खत्म होने तक जिंदगी में सिर्फ तीन ही काम किए-टी.वी. देखना, क्रिकेट खेलना और देर तक सोना। ग्रेजुएट होते ही उन्हें समझ आ गया कि क्रिकेटर में बन नहीं सकता, सोने में कॅरियर बनाया नहीं जा सकता, बचा टी.वी. जो देखा तो बहुत था, मगर उसमें दिखने की तमन्ना बाकी थी। यही तमन्ना उन्हें दिल्ली ले आई। जर्नलिज्म का कोर्स किया और छुट-पुट नौकरियों में शोषण करवाने के बाद वो टी. वी एंकर हो गए।
एंकर बन परदे पर दिखने का शौक पूरा किया तो लिखने का शौक पैदा हो गया। हिम्मत जुटा एक रचना अखबार में भेजी। उनके सौभाग्य और पाठकों के दुर्भाग्य से उसे छाप दिया गया। इसके बाद तो उनका दुःस्साहस बढ़ा और एक एक कर उन्होंने कई अखबारों में रायता फैलाना शुरू कर दिया। हिंदी हास्य-व्यंग्य की जिस दुर्गति के लिए जानकार अखबारी कॉलमों को जिम्मेदार मानते हैं, उसमें ये अपनी महती भूमिका पिछले आठ साल से निभा रहे हैं।
सिर्फ अखबार और टी.वी. में लोगों को परेशान कर जब इनका दिल नहीं भरा तो ये सोशल मीडिया की ओर कूच कर गए। 2011 में khabarhanuzi.cum के नाम से हास्य व्यंग्य का पोर्टल लॉञ्च किया। अपने वनलाइनर्स के माध्यम से हजारों लोगों को आज ये ट्विटर पर अपने झाँसे में ले चुके हैं। जल्द आनेवाली एक हिंदी फिल्म के डायलॉग्स का कुड़ी भी इनके हाथों हुआ है।
वर्तमान में सहारा समय' चैनल में डिप्टी एडिटर/एंकर के पद पर कार्बरत है । सहारा समय पर हो हास्य- व्यंग्य के कार्यक्रम' अर्थात् 'के जरिए लोगों को राजनीति और बाकी दुनिया की बातों का अनकहा मतलब समझा रहे हैं। 'खबरबाजी' के संपादन के अलावा 'दैनिक हिंदुस्तान' और 'नवभारत टाइम्स' में साप्ताहिक कॉलमों के जरिए भी लोगों पर जुल्मवाने का सिलसिला जारी है।
यह पुस्तक लेखक के उसी जुल्म की दास्ता का एक और किस्सा है। और ज्रस उम्मीद के आपके हाथों में है कि इसका हिस्सा बनकर आप इस किस्सी को सुनाने लायक बना पाएंगे।
Book format : Paperback
Language : Hindi
Book genre : Fiction , Humour
Number of pages : 175
Publisher : Prabhat
ISBN : 978-93-5048-844-7
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