Pragativaad By hansraj rehbar

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  • Author Name : Hansraj Rehbar
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About Book : 1928-29 के दो बरस हमारी राजनीति में क्रान्तिकारी उभार के बरस थे। इस क्रान्तिकारी उभार से गुणात्मक परिवर्तन यह आया कि हमारा पुराना आतंकवादी आंदोलन नए क्रांतिकारी आंदोलन में परिवर्तित हुआ। हिन्दुस्तान समाजवादी गणतंत्र दल ने, जिसका ध्येय शुरू ही से मुकम्मिल आजादी था. अब अपने ध्येय की यह व्याख्या की कि हम अंग्रेज के हाथ से सत्ता छीन कर मजदूर किसान के हाथ में देना और मार्क्स के सिद्धांतों के अनुसार एक नए समाज का निर्माण करना चाहते हैं यह गुणात्मक परिवर्तन राजनीति में आया तो उसका विचार और साहित्य में आना अनिवार्य था।

साहित्य को परखने की एकमात्र कसौटी जनता का क्रान्तिकारी व्यवहार है। प्रगतिशील अथवा जनवादी साहित्य यह है जो जन-संघर्षं के उच्चतम रूप से जुड़ा हुआ हो और किसी न किसी रूप में उसको प्रतिबिम्बित करता हो और ऐसा ही साहित्य अन्ततोगत्वा क्लासीकल बनता है।

साहित्य को राजनीति से अलग रखने की बात भी अपने में एक राजनीति है और वह जनता के शोषका उत्पीड़कों की राजनीति है। जो लेखक शोषकों-उत्पीड़कों की राजनीतिक सेवा करते हैं, उन्हें हर तरह की सुख-सुविधाएँ मयस्सर (उपलब्ध) होती हैं और वक्ती तौर पर उनके नाम भी उछाल दिये जाते हैं। आखिर समय उन्हें उठाकर इतिहास के घूरे पर फेंक देता है। उनमें से बहुतेरे अपने ही जीवन में खत्म हो जाते हैं। हमने ऐसे कितने ही नामों को मिटते देखा है और देख रहे हैं।

Product details

  • Language ‏ : ‎ Hindi
  • Author Name  : Hansraj Rehbar
  • Publisher : Sakshi paperbacks
  • Paperback ‏ : ‎ 280 pages
  • ISBN :  81-86265-82-1

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