MAA By Munawwar Rana

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  • Author Name : Munawwar Rana
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About book - (इसी पुस्तक से) ज़ख़्म कैसा भी हो कुरेदिए तो अच्छा लगता है। माज़ी कैसा भी रहा हो सोचिए तो मज़ा आता है। बचपन जैसा भी गुज़रा हो राज-सिंहासन से अच्छा होता है। मुझे नहीं मालूम ज़मींदारी कैसी होती है क्योंकि मैंने बारहा माँ को भूखे पेट सोते देखा है। मुझे क्या पता ज़मींदार कैसे होते हैं, क्योंकि मैंने मुद्दतों अपने अब्बू के हाथों में ट्रक का स्टेयरिंग देखा है। मैंने बहुत से ख्वाब देखे हैं। मुमकिन है मेरे अब्बू ने भी ख्वाब देखे हों क्योंकि एक थका-माँदा ट्रक ड्राइवर बहुत बेखबरी की नींद सोता है। लेकिन मुझे मालूम है मेरी माँ ने कभी ख़्वाब नहीं देखा था क्योंकि ख़्वाब तो वे आँखें देखती हैं जो सोती हैं, लेकिन मैंने अम्मी को कभी सोते हुए नहीं देखा। उनकी आँखें हमेशा घर की दहलीज़ पर और जिस्म जा-नमाज़ पर रक्खा देखा है और जवानी उस ट्रक ड्राइवर के इन्तज़ार में क़तरा-क़तरा पिघलते देखी है जो मेरे अब्बू भी थे और अम्मी के सर का आँचल भी।

About Author - मुनव्वर राना - जन्मः 26 नवम्बर, 1952 को रायबरेली, उत्तर प्रदेश में जन्मे। सैयद मुनव्वर अली राना यूँ तो बी. कॉम. तक ही पढ़ पाये किन्तु जिन्दगी के हालात ने उन्हें ज्यादा पढ़ाया भी उन्होंने खूब पढ़ा भी। ग़ज़ल गाँव, पीपल छाँव, मोर पाँव, सब उसके लिए, बदन सराय, घर अकेला हो गया, मुहाजिरनामा, नीम के फूल, कहो ज़िल्ले इलाही से, बगैर नक्शे का मकान, सफ़ेद जंगली कबूतर और मुनव्वर राना की सौ ग़ज़लें हिन्दी व उर्दू में प्रकाशित हुई। कई किताबों का बांग्ला व अन्य भाषाओं में अनुवाद भी हुआ।

About Author - Munawwar Rana

Book format - Paper back

ISBN : 978-81-8143-713-6.

 

 

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