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About Book : एक लंबे अरसे से मेरे भीतर जनजातीय समाज के लिए पीड़ा की जो ज्याला घपक रही है, वह मेरी चिता के साथ ही शांत होगी .." ये उद्गार बंग्ला की सुप्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी के हैं जिन्होंने अपना पूरा जीवन और साहित्य भारतीय जनजातीय समाज को समर्पित कर दिया है इसीलिए स्वयं लेखिका द्वारा संकलित इस संग्रह की नौ में से आठ कहानियों के केंद्र में आदिवासी मनुष्य है, जो समाज की मूलधारा से कटकर जी रहा है। इन कहानियों में जिस आदिवासी समाज अथवा जिन जनजातियों को पहचाना जा सकता है, वे हैं बागदी (बाढ़), डोम (वायेन), पाखमारा (शाम सवेरे की मा), उरांव (शिकार), गंजू (बीज), माल अथवा ओझा (बहुला), संथाल (द्रौपदी), दुसाध (मूल अधिकार और भिखारी दुसाध)। ये कहानियां लोककथाओं और पुराकयाओं के सहारे कही गयी हैं। महाश्वेता देवी के ही शब्दों में "... मैं पुराकथा, पौराणिक चरित्र और घटनाओं को वर्तमान के परिप्रेक्ष्य में फिर से यह बताने के लिए लिखती हैं कि वास्तव में लोककथाओं में अतीत और वर्तमान एक अविच्छिन्न धारा के रूप में प्रवाहित होते हैं ... ।"साहित्य अकादमी सहित अनेक साहित्यिक पुरस्कारों से सम्मानित महाश्वेता देवी के उपन्यास, कहानियां और नाटक लगभग सभी प्रमुख भारतीय भाषाओं में अनूदित हुए हैं।
About Author : Mahashweta Devi
Translated By : Dr. Maheshwar
Book Format : Paperback.
ISBN :978-81-237-0533-0.
Language: Hindi
Book Genre: Literature fiction short stories
Number of pages: 174
Publisher: National Book Trust.
Dimension : 8.5 INCH X 5.5 INCH
Weight : 220gm
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