Bichchu Fuffi by Ismat Chugtai

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  • Author Name : Ismat Chughtai
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  • Book condition : Good condition preloved book

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  •  About Book :फूफी बादशाही बावजूद बालों के वही मुन्नी सी बिच्छू लग रही थीं, जो बचपन में भाइयों से मचल-मचल कर बात मनवा लिया करती थीं। उनकी शेर जैसी खुर्राट आँखें एक मेमने की मासूम आँखों की तरह सहमी हुई थीं। बड़े-बड़े आँसू उनकी संगमरमर की चट्टान जैसे गालों परबह रहे थे। “हमें कोसो बिच्छू बी।” अब्बा ने प्यार से कहा। मेरी अम्मा ने सिसकते हुए बादशाही खानम से कोसने की भीख माँगी। या अल्लाह... या अल्लाह... उन्होंने गरजना चाहा। मगर काँप कर रह गयीं “या... या अल्लाह... मेरी उम्र मेरे भैया को देदे... या मौला... अपने रसूल का सदक़ा..." वह उस बच्चे की तरह झुँझलाकर रो पड़ीं जिसे सबक़ याद न हो। सब के मुँह सफेद हो गये। अम्मा के पैरों का दम निकल गया। या ख़ुदा आज बिच्छू फूफी के मुँह से भाई के लिए एक कोसना न निकला। केवल अब्बा मियाँ मुस्कुरा रहे थे जैसे उनके कोसने सुनकर मुस्कुरा दिया करते थे। सच है बहन के कोसने भाई को नहीं लगते। वह माँ के दूध में डूबे हुए होते हैं।
  • About Author :इस्मत चुग़ताई 1912-1992 ई.उर्दू कथा साहित्य में अपनी बेबाक अभिव्यक्ति के लिए अलग से जानी जाती हैं। उनकी कृतियों में मानवीय करुणा और सक्रिय प्रतिरोध का दुर्लभ सामंजस्य है जिसकी बिना पर उनकी सर्जनात्मक प्रतिमा की एक विशिष्ट पहचान बनती है। अलीगढ़ में अपने चंगेजी खानदान के जिस वातावरण में वे पली-बढ़ीं उसमें एक विद्रोही व्यक्तित्व के निर्माण की पुस्ता ज़मीन मौजूद थी। 'अंगारे' (1935) में शामिल महिला कथाकार रशीद जहां से वे बहुत प्रभावित थीं । इसीलिए जब अलीगढ़ में धार्मिक संकीर्णतावादियों ने 'अंगारे' के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाई तो इस्मत इस आवाज़ को दबानेवाली पहली महिला लेखिका थीं। उस समय इस्मत ने व्यंग्य के साथ कहा था, "अंगारे और वह भी मुसलमानों की जागीरी जबान में!" सामाजिक हस्तक्षेप की इस भूमिका के साथ इस्मत की रचना यात्रा शुरू हुई और उन्होंने उर्दू कथा साहित्य को अपनी बहुमूल्य रचनाओं से समृद्ध किया। उनकी महत्त्वपूर्ण कृतियों में से कुछ इस प्रकार हैं: उपन्यास : जिद्दी (1941); टेढ़ी लकीर (1943), 'अजीब आदमी' (1964); गुनहगार (2008); कहानी संग्रह : एक बात (1942); दो हाथ, चोटें, सॉरी मम्मी, चिड़ी की दुक्की (2003); आलोचनाः एक क़तरए-खू; नाटक : फ़सादी और आत्मकथा : कागजी है पैरहन (1994) ।
  • ISBN : 978-93-5000-963-5.
  • Language: Hindi 
  • Book Genre: Literary - fiction - novel 
  • Number of pages: 61
  • Publisher: Vani Prakashan 
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