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About book :| दुनिया तेजी से बदली है।वर्षों पहले नहीं, बस जरा दस- बीस साल पीछे चले जाइये तो पर्दे में भी रही एक पिछड़ी दुनिया हमारे सामने आ जाती है। अब ज़रा सोचिये कि इस्मत ने जब लिखने की कल्पना की होगी, तब की दुनिया कैसी होगी. लेकिन इस्मत तो इस्मत थी। अपने समय से काफी आगे चलने वाली काफी आगे देखने वाली इस्मत के लिहाफ में हलचल हुई तो कट्टरवादी भौचक रह गये। तरक्की पसंदों को एक मज़बूत | हथियार और सहारा मिल गया। मंटो को एक बेहतरीन लड़ाकू दोस्त। इस्मत का 'लिहाफ' हिलता था और सारे जग की नंगी सच्चाई उगल देता था। शायद इसलिए इस्मत पर फतवे भी लगे मुकदमें भी हुए। उनके साहित्य को 'गंदा और भौंडा' साहित्य कहने वालों की भी कमी नहीं थी। मगर इस्मत तेजी से अपनी कहानियों की 'मार्फत', विशेषकर महिलाओं के दिल में जगह बनाती जा रही थी क्योंकि इन कहानियों में एक नयी दुनिया आबाद थी। यहां औरत कमज़ोर और मजलूम नहीं थी वो सिर्फ अन्याय के आगे हथियार डालकर 'औरत-धर्म निभाने को मजबूर नहीं थी बल्कि वो तो मर्दों से भी दो कदम आगे थी। अर्थात कही कही तो वो 'आबिदा' (जंगली कबूतर) भी थी यानी इंसान से भी दो कुदम आगे की उम्मीदवार। इस्मत की कहानियों का तर्जुमा आसान नहीं। सबसे भारी मुसीबत है- भाषा क्योंकि इस्मत की कहानियों में विषय के साथ सबसे चौंकाने वाली चीज होती है- 'भाषा' आप इस अजीबो-गरीब भाषा का क्या करेंगे। गालिब के अशआर का तर्जुमा यदि मुमकिन है तो इस्मत की कहानियों का भी तर्जुमा हो सकता है। मगर आप जानिये, गालिब तो गालिब थे, गालिब का असल मज़ा तो भाषा में है। वस यहीं इस्मत को भी 'छका' देती है। निगोही, ऐसी अजीबों गरीब ज़बान का इस्तेमाल करती हैं कि बड़े- बड़ों और अच्छे-अच्छों के पसीने निकल आये। इस भाषा के लिए अलग से 'अर्थ की दुकान नहीं खोली जा सकती, इसलिए ज़्यादा जगहों पर इस्मत की खूबसूरत ज़बान से ज्यादा छेड़-छाड़ की कोशिश नहीं की गयी है। हाँ, कहीं-कहीं हिन्दी तर्जुमा ज़रूरी मालूम हुआ है, तो लफ्ज़ बदले गये हैं, तजुमें में नबी अहमद ने सहयोग दिया है।
About Author : इस्मत चुग़ताई (1912-1992 ई.) उर्दू कथा साहित्य में अपनी बेबाक अभिव्यक्ति के लिए अलग से जानी जाती हैं उनकी कृतियों में मानवीय करुणा | और सक्रिय प्रतिरोध का दुर्लभ सामंजस्य है जिसकी बिना पर उनकी सर्जनात्मक | प्रतिमा की एक विशिष्ट पहचान बनती है अलीगढ़ में अपने चग्रेजी खानदान के जिस वातावरण में वे पली-बड़ी उसमें एक विद्रोही व्यक्तित्व के निर्माण की पुख्ता जमीन मौजूद थी। 'अंगारे' (1935) में शामिल महिला कथाकार रशीद जहां से वे बहुत प्रभावित थीं। इसीलिए जब अलीगढ़ में धार्मिक संकीर्णतावादियों ने 'अंगोर' के खिलाफ आवाज़ उठाई तो इस्मत इस आवाज़ को दबाने वाली पहली महिला लेखिका थीं। उस समय इस्मत ने व्यंग्य के साथ कहा था, "अंगारे और वह भी मुसलमानों की जागीरी ज़बान में।" सामाजिक हस्तक्षेप की इस भूमिका के साथ इस्मत की रचना यात्रा शुरू हुई और उन्होंने उर्दू कथा साहित्य को अपनी बहुमूल्य रचनाओं स समृद्ध किया। उनकी महत्वपूर्ण कृतियों में से कुछ इस प्रकार हैं: उपन्यास : ज़िद्दी (1941), टेढ़ी लकीर (1943), 'अजीब आदमी' (1964) कहानी संग्रह : एक बात (1942), दो हाथ, चोटे, सारी मम्मी, चिड़ो की दुक्की (2003) आलोचना : एक कतरए नाटक फ़सादी और आत्मकथा : कागजी है पैरहन (1994).
Book format : Paperback
Book genre : Literary Fiction Novel .
Number of pages : 88
ISBN :81-8143-346-7
Publisher : Diamond books.
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