Haveli ke Andar by Rama Mehta

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  • Author Name : Rama Mehta
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About book: हवेली का बाहर से भले ही कोई स्वरूप न हो, मगर इसके भीतरी हिस्से में एक योजनावद्ता है। इसकी बारादरियाँ हवेली को कई हिस्सों में बाँटती हैं अपने में संपूर्ण हिस्सों का बंटवारा यहाँ जरूरी था क्योंकि उदयपुर की औरतें परदा करती हैं। उनकी गतिविधियों जी की मरमरी हवेली के नौकरों वाले हिस्से में एक तूफानी रात को सीता का जन्म हुआ था लछमी एक चटाई पर निढाल पड़ी हुई थी और सरजू दाई उसके बगल में बैठी हुई थी। एक चिथड़े में लिपटी सीता अपनी माँ से सटी अंगूठा चूस रही थी। सरजू ने थोड़ी देर इंतजार किया कि पानी रुक जाएगा लेकिन जब उसने कड़कती हुई बिजली देखी, वह वहीं पाँव फैलाकर लेट गयी और अपने सर को कपड़ों के एक गट्ठर का सहारा दिया।

"लड़की हुई है," लछमी का पति गंगाराम बच्चे का रोना सुनकर अफसोस के साथ बुदबुदाया। वह और खयाली रसोइया जन्म का समाचार सुनने के लिए हवेली के सदन में बैठे हुए थे। गंगाराम का अंदाज़ा सही था, अगर लड़का हुआ होता तो सरजू इस बरसात और बिजली में भी चिल्लाती हुई आती : "लड़का हुआ है ! नेग दो " गंगाराम ने बीड़ी का एक लंबा कश खींचा और उसे हताशा के साथ दूर फेंक दिया।

"फिक्र मत करो ! भगवान सबको देखता है। वही सबको दुनिया में भेजता है, मानता हूँ कि लड़कियाँ बोझ होती हैं, मगर कोई कर क्या सकता है ?" ख्याली ने हमदर्दी और स्नेह के लहजे में कहा, "अब तक में किस्मत वाला रहा हूँ, लेकिन आगे की कौन जानता है ?" रसोइए ने जम्हाई लेते हुए कहा, "पता नहीं, नथी मालकिन को क्या कुछ होता है ? डॉक्टरनी तीन घंटे पहले गयी है। जो भी हो, जल्दी हो आधी रात बीत चुकी है। पैसे वाले भूल जाते हैं कि नौकरों को भी आराम चाहिए।"

"अरे ! उसे तो बेटा होगा अमीर जो चाहते हैं वह उन्हें मिल जाता है। बदनसीबी तो हम गरीबों की है !" गंगाराम ने कड़वाहट के साथ कहा । वह कुछ और कहना ही चाहता था कि सीढ़ियों पर पदचाप के साथ ऑगन का दरवाज़ा चरमराकर खुला, "कौन कहेगा कि इस हवेली में पन्द्रह-पन्द्रह नौकर हैं ? काम के वक्त सब लापता रहते हैं। तुम्हें खाली यह बुढ़िया ही दिखेगी।" पारी उन दोनों को तरेरती हुई बोली, "बारह घंटे से फिरकनी-सी डोल रही हूँ। डोलूँ भी क्यों न ? मालिक संग्राम सिंह की हवेली में पहली परपोती जो जन्मी है।" स्वर में कुछ अधिक बल देकर बोली, "लड़की हुई तो क्या ! इसका मतलब यह नहीं कि सारे नौकर गायब हो जायें। यह बैठकर सुट्टा लगाने का समय है ? गंगा कहाँ  है ? (इसी पुस्तक से )

About author : भारतीय अंग्रेजी की सुप्रसिद्ध उपन्यासकार और समाजशास्त्री श्रीमती रमा मेहता (1923-1978) का जन्म लखनऊ में हुआ। आई.टी. कॉलेज, लखनऊ से स्नातक की उपाधि प्राप्त करने के बाद उन्होंने दिल्ली, मिशिगन तथा कोलंबिया विश्वविद्यालयों से क्रमशः दर्शनशास्त्र में एम. ए. तथा मनोविज्ञान एवं समाजशास्त्र में विशेष शिक्षा प्राप्त की। 1949 में वे विदेश सेवा के लिए चुन ली गई थीं। यह सम्मान तब भारत की पहली कुछ महिलाओं को ही प्राप्त था सेवा मुक्त हो जाने के उपरांत उन्होंने देश विदेश का खूब भ्रमण किया उनके कई आलेख भी प्रतिष्ठित पत्रों में प्रकाशित हुए श्रीमती मेहता अमेरिका के रैडक्लिफ हार्वर्ड संस्थान की सदस्या रहीं और उन्होंने सौरबौन तथा एथेन्स में व्याख्यान भी दिये।इन्साइड द हवेली को भारतीय अंग्रेजी साहित्य में वर्ष 1979 का साहित्य अकादेमी पुरस्कार प्राप्त हुआ उनकी अन्य कृतियों हैं- रामू (उपन्यास) तथा लाइफ ऑफ केशव। उन्होंने भारतीय स्त्रियों से जुड़ी समस्याओं पर समाजशास्त्रीय ग्रन्थ भी लिखे हैं। हवेली के अंदर पुरस्कृत उपन्यास इन्साइड द हवेली का हिन्दी अनुवाद है। इसमें उदयपुर स्थित सज्जनगढ़ रियासत की सुप्रसिद्ध हवेली की अंतरंग गाथा को बहुत ही प्रामाणिक ढंग से अंकित किया गया है इसमें चार-चार पीढ़ियों के दुख-दर्द, हर्ष-विषाद तथा सामंतवादी रूढ़ियों एवं प्रगतिशील मूल्यों के टकराव और अंतर्द्वद्ध को बड़ी कुशलता से उकेरा गया है।प्रस्तुत कृति का हिन्दी अनुवाद श्रीमती कांति सिंह ने किया है।

Book Format : Paper Back.

Language : Hindi 

Book genre : Litreary fiction novel . 

Number of pages : 147

Publisher : Sahitya akedami

ISBN : 978-81-7201-805-3

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