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About Book : यह कैसी सामाजिक विडम्बना है कि इन्सान जो पाने की आकांक्षा करता है, वह उसे कभी नहीं मिल पाता। लेकिन जिसकी आकांक्षा बिलकुल नहीं रहती, वह उसे अनायास ही मिल जाता है। सृष्टि की रहस्यमयता और विलक्षणता मनुष्य के आकर्षण का केन्द्र बिन्दु है। नारी प्रकृति की ऐसी अनुपम देन है, जो पुरुष की छाया से कभी बच नहीं सकती। नारीत्व की पूर्णता उसके मातृत्व में सन्निहित है। सांसारिक वासनाओं की तृप्ति के लिए वह पुरुष का पतित्व स्वीकार करती है, जो प्रेम के संकुचित दायरे को व्यापक बना देता है। प्रश्न है कि अन्ततः प्रेम क्या है? जिसने प्रेम का सच्चा अर्थ जाना, उसके पीछे दौड़ता रहा और कोई वासना के सागर में गोता लगाता रहा। वासना के बिना आदमी जीवित नहीं रह सकता। वे लोग वासना के कीड़े होते हैं, जो विष से भरे हुए चुम्बन को प्यार की पहली सीढ़ी मान लेते हैं। वस्तुतः प्रेम भावनात्मक होता है और वास्तविक प्रेम की अनुभूति इन्सान को तब होती है, जब शरीर और आत्मा का मिलन होता है। दो हृदय, दो मस्तिष्क और दो बुद्धि के बीच स्थापित होनेवाले सामंजस्य को ही प्रेम की संज्ञा दी गई है। सुख और शान्ति का सीधा सम्बन्ध मन और आत्मा से है। चरम आकांक्षा और मन की शान्ति के लिए इन्सान को साधना की आवश्यकता होती है। पागल दुनिया में निरंजन-कामिनी, अखिल-चाँदनी और धनंजय-चाँदनी-इन तीन प्रणय (कलह) कथाओं को एक सूत्र में गूँचकर, उपन्यासकार ने पात्रों की मानसिकता, विचारों की परिपक्वता और संवादों की तीव्रता से एक ऐसी कृति का निर्माण किया है, जो पाठकों को एक नया आस्वाद और अनुभव प्रदान करेगी।
About Author - बीसवीं शती के छठे दशक के कौशल गद्य- शिल्पी सुधांशु 'शेखर चौधरी (1920-1990) मैथिली साहित्य में एक विशिष्ट उपन्यासकार, सफल नाटककार, प्रखर आलोचक, कवि और सम्पादक के रूप में प्रतिष्ठित हैं। उन्होंने साप्ताहिक 'मिथिला-मिहिर' (1960-1982) का सम्पादन कर कतिपय प्रतिभाशाली नौजवानों को साहित्य सृजन की ओर उन्मुख किया था। उन्होंने हिन्दी और मैथिली में समान रूप से रचना की। उनकी तरपट्टा ऊपर पहा (1961), दरिद्र दिंडी (1974), ई बतहा संसार (1979) और निवेदिता (1996) आदि मैथिली के मौलिक और चर्चित उपन्यास हैं। भफाइत वाहक जिनगी (1975), लेटाइत जाँचर (1976), पहिल साँझ (1982), लगक दूरी (1992) और हथटूटा कुर्सी (1992) उल्लेखनीय मौलिक नाटक और एकांकी हैं। संदर्भ (1981) उनके आलोचनात्मक निबंधों का संग्रह और गीत ओ गजल (1992) काव्य-संग्रह है। उन्होंने पराशर गेनालाल यादव, कामदेव श्रीवास्तव और शेफालिका देवी आदि छद्म नामों से भी मैथिली गद्य-भण्डार को अभिवर्द्धित किया। उनके कई उपन्यास और आत्मकथा अब तक अप्रकाशित हैं। ई बतहा संसार मैथिली की विशिष्ट औपन्यासिक कृति है, जिसके लिए 1980 ई. में उन्हें साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था।
प्रस्तुत उपन्यास के अनुवादक डॉ. प्रेम शंकर सिंह हिन्दी और मैथिली के विशिष्ट साहित्य-चिन्तक हैं, जिनकी मैथिली नाटक ओ रंगमंच (1978), मैथिली नाटक परिचय (1981), पुरुषार्य ओ विद्यापति (1986), मिथिलाक विभूति जीवन झा (1987) और नाट्रयान्वाचय (2001) मौलिक एवं अनेक सम्पादित कृतियाँ हिन्दी और मैथिली में प्रकाशित हैं। सम्प्रति आप तिलका माँझी भागलपुर विश्वविद्यालय में मैथिली विभाग के आचार्य एवं अध्यक्ष हैं।
Book format: Hardcover
Language: Hindi
Book Genre: Literature fiction novel .
Number of pages: 228
Publisher: Sahitya akadami
ISBN : 81-260-1028-2
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