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About book :छायावाद के सबल स्तंभ जयशंकर प्रसाद (1889-1937) उपन्यासकार, नाटककार और कहानीकार के रूप में भी समान रूप से ख्यात हैं। यह आश्चर्यजनक है कि कविता के क्षेत्र में ये छायावादी और आदर्शवादी माने जाते हैं, किंतु कहानी के क्षेत्र में यथार्थवादी दिखते हैं। ग्रामीण यथार्थ का जैसा रूप धनकी कहानियों में व्यक्त हुआ है, उस युग में उसकी कल्पना भी असंभव थी। महाजनी सभ्यता के अमानवीय पक्ष के कारूणिक वित्रण में लेखक की सूक्ष्म और सटीक वस्तुवादी दृष्टि का परिचय मिलता है। तत्व चिंतक की तरह अपनी हर कहानी में कोई न कोई दार्शनिक तत्य अवश्य सामने लाते हैं। स्वाधीनता पूर्व के अंग्रेज- पोषित भारतीय जमींदारों की धज्जियां उनकी कहानियों में भली-भांति उड़ाई गई हैं इनका शिल्प प्रयोग और रचना-कौशल परवर्ती कथाकारों के लिए प्रेरणास्पद रहा है। हिन्दी साहित्य में सन 1930 के बाद पश्चिम के प्रभाव से बथार्थवादी आंदोलन जब प्रबल हो रहा था, और कया सम्राट प्रेमचंद, कथा साहित्य में उसका प्रतिनिधित्व कर रहे थे, उन्हीं दिनों जयशंकर प्रसाद एक अलग शिल्प के साथ हिन्दी कहानी को दिशा दे रहे थे। जयशंकर प्रसाद की श्रेष्ठ कहानियां उनकी ऐसी ही सत्रह कहानियों का चयन है कई कविता संकलन, कथा संकलन, उपन्यास एवं नाटक के रचनाकार जयशंकर प्रसाद की ये कहानियां आज भी हमारे लिए ताजा और समकालीन है।
About Author : Jaishankar prasad
Edited By - Vijay Mohan Singh
Book genre : Short stories,Fiction
Book format : Paper back
Number of pages : 149
Publisher : National book trust
ISBN : 978-81-237-4582-4
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