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- About Book : दोहरा अभिशाप : दलित साहित्य के आम उपन्यासों की तरह बैसंत्री का यह उपन्यास भी आत्मकथात्मक है; लेकिन कई अन्य बातों में यह आम दलित साहित्य के उपन्यासों से भिन्न है यह उपन्यास लेखिका के लंबे, संघर्षपूर्ण, कड़वे-मीठे अनुभवों से भरे जीवन के एक सिंहावलोकन के रूप में लिखा गया है अतः यह आत्मरति या आत्मपीड़न से उत्पन्न उन स्तब्धकारी प्रभावों से मुक्त है जो आम तौर पर दलित साहित्य की रचनाओं में पाए जाते हैं । इसमें ऐसे प्रसंग नहीं हैं कि पाठक क्रोध, घृणा और जुगुप्सा के भावों से भर जाए या दाँतों तले अंगुली दबाकर रह जाए । यह एक सीधी-सादी जीवन-कथा है जो हर प्रकार के साहित्यिक छलों से मुक्त है। आत्मकथात्मक उपन्यासों (और आत्मकथाओं में भी) में लेखक की प्रवृत्ति अपने अनुभवों को अनन्य बनाने की होती है अर्थात जो हमने भोगा और सहा है वह किसी और ने भोगा या सहा नहीं होगा । यह प्रवृत्ति उसे जीवन को एकांगी दृष्टि से देखने को विवश करती है और इसके साथ ही उस रचना में भी एकांगीपन और एकरसता आ जाती है । दलित साहित्य में यह प्रायः देखने को मिलता है । इसका औचित्य सिद्ध करने के लिए यह तर्क दिया जा सकता है कि दलितों के जीवन में पीड़ा, घुटन और अपमान के सिवा और है क्या ? लेकिन अगर इसके सिवा और कुछ नहीं होता तो आदमी जीता क्यों और कैसे है ? घोर-से-घोर परिस्थितियों में भी आदमी अपने लिए एक सुरक्षित नीड़ का निर्माण कर लेता है। आदमी ही क्यों, पशु-पक्षी भी अपने लिए नीड़ का निर्माण करते हैं जहाँ वे आस-पास के तमाम खतरों, दुखों और परेशानियों से मुक्ति का अहसास प्राप्त करते हैं । इस नीड़ का निर्माण वे प्रेम से करते हैं-बच्चों का प्रेम, माता-पिता का प्रेम, मित्रों और परिवारजनों का प्रेम, अनजान व्यक्तियों का प्रेम और कुल मिलाकर जिंदगी से प्रेम । इस प्रेम के बिना कोई जी नहीं सकता । यह जिंदगी का कारण भी है और उसकी सार्थकता भी । यह मृत्यु से लड़ने और उस पर विजय प्राप्त करने की शक्ति आदमी को देता है । कोई भी जीवन प्रेम के बिना नहीं हो सकता, भले ही जीवन की स्थितियाँ कितनी ही विकट हों । इसलिए यह कहना कि दलितों के जीवन में और होता ही क्या है, इकतरफा और जल्दबाजी का वक्तव्य है । कौसल्या बैसंत्री के इस उपन्यास में दलित जीवन का एक सम्यक् और सर्वांगपूर्ण चित्र प्रस्तुत किया गया है । इसमें पारिवारिक प्रेम. विशेषकर बच्चों के लिए माँ के संघर्ष का जो खूबसूरत चित्र है, वह इस उपन्यास को दलित साहित्य में विशिष्टता प्रदान करता है छोटी-छोटी बातें, छोटे-छोटे सरोकार जिजीविषा के रस से सिंचित होकर जीवन में तथा उपन्यास में भी कितने महत्त्वपूर्ण हो जाते हैं यह बोध पाठक को यह उपन्यास पढ़ने के बाद हो सकता है ।
- About Author : Kaushlya Baisntry
- ISBN :978-81-88121-98-4.
- Book format: Hardcover .
- Language: Hindi
- Book Genre: Literary fiction social novel.
- Number of pages: 208
- Publisher: Parameshwari Prakashan.
- Dimension : 22.5 x 14.5 x 1.6 cm.
- Weight : 240gm
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